
क्या आप जानते हैं दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी एक भारतीय सर्जन महर्षि सुश्रुत ने की थी और वह 2600 साल पहले प्राचीन भारत के वैद्य जिन्हें शल्य चिकित्सा के जनक कहा जाता है। उन्होंने 300 सर्जरीज का आविष्कार भी किया और उसे सिखाया भी।
आखिर कहां से मिली सुश्रुत को सर्जरी की प्रेरणा और कैसे किया उन्होंने यह आविष्कार ऐसे ही सवालों के जवाब हम आज जानेंगे-
लगभग 26 साल पहले वैदिक काल खंड में एक ऋषि रहते थे जिनका नाम था सुश्रुत।सुश्रुत उत्तर भारत की पुरातन और पवित्र शहर काशी में रहते थे जो आज बनारस या वाराणसी नाम के नाम से जाना जाता है।
उस जमाने में ज्ञानियों को साधु या महर्षि कहां जाता था।ऐसे ही एक ज्ञानी सुश्रुत भी थे काशी के महाराज काशिराज दिवोदास से महर्षि सुश्रुत ने औषधि का ज्ञान प्राप्त किया और वह वैद्य बने एक वैध होने के नाते वह उस समय में युद्ध में घायल हुए सैनिकों का इलाज करते थे। उन सैनिकों की अवस्था को देख सुश्रुत को सर्जरी की प्रेरणा मिली, जिससे वह सैनिकों की शरीर की टूटे हुए अंग या जख्मों को सर्जरी या शल्यक्रिया के द्वारा ठीक कर सके।राइनोप्लास्टी सर्जरी (नाक की सर्जरी) का अविष्कार किया। जिससे वे टूटे हुए नाक को दोबारा जोड़ सकें।
सुश्रुत दुनिया के पहले कैटरेक्ट सर्जन भी थे। जिन्होंने कई लोगों की आंखों के दोष को ठीक किया था। करुणा और स्नेह से अपना काम करने वाले सुश्रुत ने सर्जरी जैसी वैज्ञानिक विद्या का आविष्कार किया, जो कि उस समय में बिल्कुल ही नया था, इन्हीं कारणों की वजह से उन्हें”संपूर्ण शल्य चिकित्सा के जनक”भी माना जाता है।

सर्जरी के आविष्कार के साथ-साथ सुश्रुत को ज्ञान हुआ कि इन्हें कई सारे सर्जिकल उपकरण की भी जरूरत होगी और जरूरत ही हर खोज की जड़ होती है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सुश्रुत ने”121 उपकरण”का निर्माण किया और ऐसा करने वाले वह दुनिया के पहले शल्य चिकित्सक (सर्जन) थे।
इन आविष्कारों से यही पता चलता है कि महर्षि सुश्रुत का ज्ञान समय की कसौटी पर खरा उतरा है। सुश्रुत ने अपने इस अमूल्य ज्ञान को विस्तार से एक संस्कृत स्क्रिप्ट के रूप में लिखा, जिसे” सुश्रुत संहिता” कहा जाता है। सर्जरी की प्रोसीजर बताने वाली यही संस्कृतस्क्रिप्चर आयुर्वेद के तीन पिलर में से एक है और अथर्ववेद का भी एक खंड है।
सुश्रुत संहिता से पता चलता है कि सुश्रुत में कैसे बिना किसी चाकू के मृत शरीर का डायसेक्शन और उनका अध्ययन किया। उनका मानव शारीरिकी का अभ्यास करने का तरीका कुछ इस प्रकार था वह मृत शरीर को पानी में रखकर उसे डीकंपोज होने देते थे और उस डीकंपोजिंग बॉडी का समय के साथ अध्ययन करते थे। इसी से उन्होंने शरीर के स्ट्रक्चर का लेयर बेल एयर निरीक्षण किया। इसी प्रयोग से सुश्रुत को सिजेरियन ऐबडोमन और ब्रेन सर्जरीज् जैसी कठीन सर्जरी करने मे सहायता मिली।
सुश्रुत संहिता के अध्याय 1.16 में राइनोप्लास्टी के बारे में विस्तार से बताया गया है।राइनोप्लास्टी के अलावा सुश्रुत कैटरेक्ट सर्जरी के लिए भी जाने जाते हैं।सुश्रुत संहिता के वॉल्यूम उत्तर तंत्र में इसके बारे में काफी विस्तार से लिखा गया है। यह प्रक्रिया मॉडर्न सर्जन स्कोर एक्स्ट्रा कैप्सूलर लेंस एक्सट्रैक्शन के समान लगती है। मगर सूरत में यही सर्जरी बिना आधुनिक उपकरणों के कर दिखाया था। जिससे उनके कौशल्य का पता चलता है।सुश्रुत संहिता 600 ईसा पूर्व में लिखी गई है सर्जरी और औषधि की अद्भुत संस्कृत स्क्रिप्ट 800 ईस्वी में अरब ट्रांसलेशन के रूप में दुनिया के सामने आई। जिसका नाम था-“किताब शाह शुन अल- हिंदी”।